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स्टेशन के बोर्ड पर क्यों लिखी होती है ‘समुद्र तल से ऊंचाई’? इसके पीछे छिपा है ट्रेन की सुरक्षा का वो वैज्ञानिक राज जो आप नहीं जानते

कभी स्टेशन पर ये नोटिस देखा? ये ऊंचाई ट्रेनों को दुर्घटना से बचाने का गुप्त फॉर्मूला है। हवा का दबाव, इंजन पावर और ब्रेकिंग सब इसी पर निर्भर। जानिए वो राज जो आपकी ट्रेन यात्रा को सुरक्षित बनाता है।

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भारतीय रेलवे के हर प्लेटफॉर्म पर एक पीला बोर्ड नजर आता है, जिसमें स्टेशन का नाम लिखा होता है और उसके नीचे एक छोटा सा आंकड़ा समुद्र तल से ऊंचाई बताता है। यह संख्या महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि ट्रेन चालकों के लिए जीवन रक्षक सूचना है। ऊंचाई की यह जानकारी ढलानों पर गति नियंत्रण, इंजन की क्षमता और ब्रेकिंग प्रणाली को सही ढंग से संभालने में सहायक सिद्ध होती है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह छोटा सा बोर्ड बड़े हादसों को रोकने का माध्यम बन जाता है।

स्टेशन के बोर्ड पर क्यों लिखी होती है 'समुद्र तल से ऊंचाई'? इसके पीछे छिपा है ट्रेन की सुरक्षा का वो वैज्ञानिक राज जो आप नहीं जानते

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

रेलवे नेटवर्क के निर्माण के समय इंजीनियरों ने समुद्र तल को आधार मानक चुना, क्योंकि यह पूरे विश्व में एकसमान संदर्भ प्रदान करता है। स्थानीय ऊंचाई मापने के बजाय वैश्विक स्तर पर दूरी नापने से पटरियों का ढलान आसानी से तय हो सका। ब्रिटिश दौर में जब लंबी रेल लाइनें बिछाई जा रही थीं, तब यह तरीका निर्माण कार्य को सरल और सुरक्षित बनाता था। बाढ़ प्रभावित मैदानी इलाकों में स्टेशनों को थोड़ी ऊंचाई पर बसाया गया, ताकि जल प्रवाह से बचाव हो सके। समय के साथ यह प्रथा मानक बन गई और आज भी कायम है।

ट्रेन संचालन में महत्व

लोको पायलट के लिए यह बोर्ड दिशा सूचक संकेतक की तरह काम करता है। यदि एक स्टेशन 150 मीटर ऊंचा है और अगला 300 मीटर पर स्थित है, तो चढ़ाई की पूर्व जानकारी मिल जाती है। चढ़ते समय इंजन को अतिरिक्त शक्ति की जरूरत पड़ती है, क्योंकि हवा का घनत्व कम होने से ईंधन दक्षता घट जाती है। डीजल इंजन ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन के कारण ठीक से जलते नहीं, जिससे गति प्रभावित होती है। उतराई पर गुरुत्वाकर्षण बल ट्रेन को तेजी से खींच लेता है, इसलिए ब्रेक समय पर लगाने पड़ते हैं। घाटी वाले रूट्स पर पहिए फिसलने का खतरा रहता है, और यह आंकड़ा उसी समय सतर्कता बरतने की याद दिलाता है।

सुरक्षा के वैज्ञानिक आयाम

विज्ञान की दृष्टि से ऊंचाई वायुदाब, तापमान और घनत्व को प्रभावित करती है। 1000 मीटर ऊपर हवा 20 प्रतिशत पतली हो जाती है, जो ब्रेक पैड्स को ठंडा रखने में बाधा डालती है। लंबी चढ़ाई पर इंजन गर्म हो सकता है, जबकि उतराई में ओवरहीटिंग संभव है। पायलट इस आधार पर ईंधन बचत और रखरखाव की योजना बनाते हैं। उदाहरण के तौर पर उधमपुर जैसे स्टेशन पर जहां ऊंचाई 1100 मीटर से अधिक है, विशेष इंजन का उपयोग अनिवार्य होता है। यह प्रणाली दुर्घटनाओं को कम करने में कारगर साबित हुई है, खासकर मानसून के दौरान भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में।

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आधुनिक तकनीक का प्रभाव

आज जीपीएस और स्वचालित सिस्टम रीयल टाइम डेटा देते हैं, फिर भी ये बोर्ड आवश्यक हैं। बिजली या सिग्नल फेल होने पर ये मैनुअल सहारा प्रदान करते हैं। रेलवे प्रशिक्षण केंद्रों में नौसिखिए चालकों को सबसे पहले इन्हें पढ़ना सिखाया जाता है। यात्री भी इससे भौगोलिक जानकारी प्राप्त करते हैं और ऊंचाई वाले इलाकों में स्वास्थ्य सावधानियां बरतते हैं। सबसे कम ऊंचाई वाले स्टेशन तटीय क्षेत्रों में हैं, जबकि हिमालयी रूट्स पर रिकॉर्ड ऊंचाई दर्ज है।

भविष्य की संभावनाएं

डिजिटल युग में भी यह परंपरा जीवंत है, क्योंकि तकनीक पूरी तरह निर्भर करने लायक नहीं। हाल के वर्षों में पहाड़ी दुर्घटनाओं में कमी इसी जागरूकता का परिणाम है। रेलवे विस्तार परियोजनाओं में नई लाइनों के लिए भी यही मानक अपनाया जा रहा है। अगली यात्रा में इस बोर्ड को गौर से देखें, यह ट्रेन यात्रा का सुरक्षा आधार है।

Author
info@divcomkonkan.in

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