उत्तर प्रदेश देश का रेल नेटवर्क वाला सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन महराजगंज जिले का मुख्यालय आज भी ट्रेनों से कोसों दूर खड़ा है। 1987 में जिला बने इस क्षेत्र में 38 साल बाद भी कोई रेलवे स्टेशन नहीं बना। निवासियों को ट्रेन पकड़ने के लिए 44 किलोमीटर दूर घुघली या नौतनवा जाना पड़ता है, जो उनकी जिंदगी को मुश्किल बनाता है।

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जिले की अनोखी दुर्दशा
महराजगंज तराई का उपजाऊ इलाका है, जहां चावल, गन्ना और सब्जियां भरपूर पैदा होती हैं। जिले के नौतनवा, फरेंदा, सिसवा बाजार और घुघली में आजादी से पहले ही रेल सुविधा शुरू हो चुकी थी। लेकिन मुख्यालय को जोड़ने वाली घुघली-महराजगंज रेल लाइन का सपना अधर में लटका है। 2018-19 में यह परियोजना मंजूर हुई, सर्वे हुए, पिलर तक लगे, लेकिन शिलान्यास रद्द हो गया। 2012-13 के रेल बजट में टोकन फंड जारी हुआ था, फिर भी काम जमीं पर नहीं उतरा। स्थानीय नेता दयानंद गुप्ता और डॉ. घनश्याम पांडेय जैसे कार्यकर्ता बताते हैं कि जर्जर सड़कों के सहारे व्यापार ठप है। किसान माल ढोने में महंगा खर्च उठाते हैं, जबकि युवा रोजगार के लिए गोरखपुर या लखनऊ पलायन कर जाते हैं। जिला मुख्यालय से निकटतम बड़ा रेल केंद्र गोरखपुर 54 किलोमीटर दूर है।
आर्थिक व सामाजिक नुकसान
रेल अभाव ने महराजगंज को विकास की रेस से बाहर कर दिया। उपजाऊ खेतों का उत्पादन बाजार तक सही दाम पर नहीं पहुंच पाता। व्यापारी मालगाड़ियों के इंतजार में परेशान रहते हैं। महिलाएं और बुजुर्ग ट्रेन यात्रा के नाम पर घंटों सड़क पर जूझते हैं। बार-बार ज्ञापन देने के बावजूद सरकारें वादे ही निभा रही हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक हानि है, बल्कि सामाजिक अलगाव भी पैदा कर रही है। पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ाव के बावजूद मुख्यालय रेल मानचित्र पर गायब सा है।
नई रेल लाइन से जग रही उम्मीदें
2025 में घुघली-आनंदनगर नई रेल लाइन परियोजना ने नई किरण दिखाई। कुल 52.70 किलोमीटर लंबी यह लाइन 52-53 गांवों को जोड़ेगी। पहले चरण में घुघली से महुअवा तक 24.8 किलोमीटर का काम तेजी से चल रहा है। भूमि अधिग्रहण लगभग पूरा, ड्रोन सर्वे से दिशा साफ हो रही है। दूसरे चरण में महुअवा से आनंदनगर तक निर्माण होगा। इससे गोरखपुर स्टेशन का बोझ कम होगा, गोंडा-पनियहवा दूरी 42 किलोमीटर घटेगी। महराजगंज स्टेशन पर पांच रेल लाइनें, दो यात्री प्लेटफॉर्म और एक माल प्लेटफॉर्म बनने हैं। किसानों को उचित मुआवजा और आधुनिक सर्वे की सुविधा मिली।
परियोजना पूरी हुई तो छुक-छुक की आवाज जिला मुख्यालय तक गूंजेगी। निवासी अब सालों पुरानी इस मिस्ट्री के अंत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विकास का पहिया तेज घूमेगा और महराजगंज रेल नेटवर्क का हिस्सा बन जाएगा।















