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Bank Privatization: सरकारी बैंकों पर विदेशियों की नजर! ₹171 लाख करोड़ की संपत्ति के साथ निजीकरण की दौड़ में ये बैंक सबसे आगे।

₹171 लाख करोड़ की दौड़ में ये बैंक टॉप पर! आपका पैसा अब किसके हाथ? निजीकरण का खतरनाक खेल शुरू, क्या होगा आपका FD और लोन? जानिए पूरी सच्चाई!

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भारत के सरकारी बैंकों की ₹171 लाख करोड़ से अधिक की विशाल संपत्ति अब विदेशी निवेशकों के निशाने पर आ चुकी है। निजीकरण की अफवाहों के बीच IDBI बैंक जैसे संस्थान वैश्विक पूंजी की पहली पसंद बन गए हैं, जबकि SBI और BoB जैसे दिग्गज भी इस दौड़ में शामिल हैं। सरकार का ‘विकसित भारत 2047’ विजन बैंकिंग सुधारों को नई गति दे रहा है, जहां विदेशी हाथों में इन बैंकों का जाना तय माना जा रहा है।

Bank Privatization: सरकारी बैंकों पर विदेशियों की नजर! ₹171 लाख करोड़ की संपत्ति के साथ निजीकरण की दौड़ में ये बैंक सबसे आगे।

निजीकरण की तेज रफ्तार क्यों बढ़ी?

1969 में 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने वाली सरकार अब उल्टी दिशा में बढ़ रही है। पहले 28 थे, अब मात्र 12 पब्लिक सेक्टर बैंक बचे हैं। IDBI बैंक का निजीकरण मार्च 2026 तक पूरा होने की कगार पर है, जहां सरकार और LIC मिलकर 95 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने को तैयार हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हालिया बजट में हाई-लेवल कमेटी गठित करने का ऐलान किया, जो विलय, निजीकरण और सुधारों की समीक्षा करेगी।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत हो सकती है। यस बैंक में जापान की सुमितोमो मित्सुई ने 13,483 करोड़ रुपये में 20 प्रतिशत हिस्सा खरीदकर इसी ट्रेंड का उदाहरण पेश किया है।

विदेशी निवेशकों का आकर्षण क्या है?

ये सरकारी बैंक कुल 98 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के लोन पोर्टफोलियो के मालिक हैं, जो विदेशी बैंकों को लुभा रहा है। SBI की संपत्ति अकेले 60 लाख करोड़ से ऊपर है, जबकि बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक और IDBI जैसे बैंक 10 से 30 लाख करोड़ के दायरे में हैं। निजीकरण से इनकी दक्षता बढ़ेगी और पेशेवर प्रबंधन आएगा, लेकिन बाजार में उतार-चढ़ाव भी दिख रहा है।

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निफ्टी PSU बैंक इंडेक्स में हालिया गिरावट के बावजूद, शुद्ध लाभ 2 लाख करोड़ पार करने की उम्मीद निवेशकों को उत्साहित कर रही है। विदेशी कंपनियां ग्रामीण बाजारों की पहुंच और डिजिटल बैंकिंग के अवसरों पर नजर रखे हुए हैं।

फायदे और चुनौतियां सामने

निजीकरण से बैंकों का व्यावसायीकरण बढ़ेगा, जो सरकारी बोझ को कम करेगा। सरकार को हर साल होने वाला वित्तीय खर्च रुकेगा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा मजबूत होगी। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन और गरीबों की पहुंच पर खतरा मंडरा रहा है। बैंक यूनियनें इसका जमकर विरोध कर रही हैं, इसे ‘बेलआउट’ का खेल बता रही हैं। फिर भी, सरकार दो-चार बैंकों से शुरुआत कर आगे बढ़ सकती है।

2026 बैंकिंग सेक्टर के लिए टर्निंग पॉइंट साबित होगा, जहां एकीकरण और निजीकरण से भारत का वित्तीय परिदृश्य हमेशा के लिए बदल जाएगा। क्या ये कदम अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएगा या नई बहस छेड़ेगा? समय ही जवाब देगा।

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info@divcomkonkan.in

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