भारत में संपत्ति खरीदते वक्त लाखों लोग एक ही ट्रिक अपनाते हैं – पत्नी का नाम लिखवा दो। वजह? स्टांप ड्यूटी में 1-2% छूट और इनकम टैक्स से बचाव। सोचते हैं कि इससे परिवार सुरक्षित रहेगा और सरकारी खर्च कम होगा। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ऐसा धमाकेदार फैसला दिया है, जो इस पूरे खेल को उलट देगा। अब सिर्फ नाम बदलने से काम नहीं चलेगा। आइए, इस फैसले की गहराई समझें।

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संपत्ति पत्नी की नहीं, तो फैमिली की कैसे बनेगी मालकियत?
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा – अगर पत्नी ने खुद की कमाई से प्रॉपर्टी नहीं खरीदी, तो उसके नाम पर रजिस्टर्ड जमीन या घर उसका निजी हक नहीं। यह पारिवारिक संपत्ति मानी जाएगी। पत्नी इसे अकेले बेच नहीं पाएगी, न दान कर पाएगी और न नीलामी।
मान लीजिए, पति ने अपनी सैलरी से 50 लाख का फ्लैट लिया और पत्नी के नाम रजिस्टर करवाया। स्टांप ड्यूटी बची, लेकिन कानून कहता है – इंडियन एविडेंस एक्ट धारा 114 के मुताबिक, पत्नी को साबित करना पड़ेगा कि पैसा उसका अपना था। न साबित हो पाया, तो संपत्ति पति की आय से बनी मानी जाएगी। परिवार के सभी सदस्यों का इसमें हक बराबर।
कानूनी मालिक कौन? पति जिंदा हो या न हो
हमारे देश में शादी के बाद ज्यादातर महिलाएं पति की आर्थिक निर्भरता पर रहती हैं। सरकार ने इसी को देखते हुए महिलाओं को टैक्स लाभ दिया। लेकिन अब हकीकत सामने – पत्नी को बेचने या ट्रांसफर का अधिकार शून्य। पति के जिंदा रहते तो बिल्कुल नहीं, और मौत के बाद भी हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956 लागू होने पर ही बच्चों के बराबर हिस्सा मिलेगा।
अगर पति वसीयत छोड़ गया, तो हिस्सा तय। बिना वसीयत के भी संपत्ति ‘फ्री’ नहीं – परिवार की सहमति जरूरी। उदाहरण लें – एक परिवार में पति गुजर गए। पत्नी ने घर बेचने की कोशिश की, लेकिन भाई-बच्चों ने रोक दिया। कोर्ट ने कहा, यह फैमिली प्रॉपर्टी है, सबका हक।
पत्नी को कब मिलेगा पूरा कंट्रोल?
कानून सख्त है, लेकिन अपवाद भी हैं:
- अपनी कमाई साबित करें: बैंक स्टेटमेंट, ITR या सैलरी स्लिप दिखाएं – संपत्ति निजी।
- पति की मौत पर: क्लास-1 वारिस बनें, हिस्सा पाएं। लेकिन बेचने से पहले सहमति लें।
- वसीयत का मामला: पति ने नाम लिखा हो, तो आसान।
यह फैसला टैक्स चोरी रोकने का बड़ा कदम है। अब लीगल एक्सपर्ट से सलाह लें, वरना मुकदमे में फंसें। क्या आपकी प्रॉपर्टी भी इसी जाल में है? सोच लें!















