
भाइयों और बहनों, सोचिए जरा, 1977 का वो दौर जब मुरादाबाद के किसान भाइयों ने अपनी मेहनत की कमाई, अपनी जमीन सरकार को सौंप दी बाजार बनाने के नाम पर। लेकिन बदले में मिला क्या? बस एक रंगीन चिट्ठी और 15.75 रुपये प्रति वर्ग गज का मुआवजा। इतने साल बीत गए, किसान भटकते रहे अदालतों के चक्कर काटते, और सरकार की तरफ से बस टालमटोल। लेकिन अब खुशखबरी! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जो सीधे किसानों के दिल को छू गया।
जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने साफ कहा – किसान का हक उसकी जमीन का मुआवजा है, ये कोई एहसान नहीं। आइए, इस पूरी कहानी को समझते हैं, जैसे घर बैठे दोस्तों से गपशप कर रहे हों।
Table of Contents
1977 का अधिग्रहण विवाद
दोस्तों, बात 1977 की है। मुरादाबाद में कृषि उत्पादन मंडी समिति को बाजार बनाने के लिए किसानों की जमीन चाहिए थी। किसानों ने देशभक्ति दिखाई, जमीन दी। लेकिन मुआवजा? वो तो मजाक था – महज 15 रुपये से थोड़ा ज्यादा प्रति वर्ग गज। आज के जमाने में सोचिए, वो पैसे से क्या खरीदते? एक छोटा सा बीज भी न चलता। किसानों ने हार न मानी। उन्होंने भूमि अधिग्रहण एक्ट की धारा 28-ए का सहारा लिया, जो कहती है कि अगर आसपास की जमीनें ज्यादा दाम पर बिकीं, तो किसानों को भी उसी अनुपात में मुआवजा मिलना चाहिए। सालों की लड़ाई चली, लेकिन किसान अडिग रहे। ये उनकी जिद नहीं, उनका हक था।
सरकार की 40 साल की लापरवाही पर तीखा प्रहार
अब सुनिए कोर्ट का वो जलवा! हाईकोर्ट ने सरकार की सारी दलीलें खारिज कर दीं। बोलीं, “किसानों को मुआवजा उनका मौलिक अधिकार है, सरकार कोई भलाई नहीं कर रही।” और देरी पर? कोर्ट ने दुख जताया कि 40 साल से ज्यादा हो गए, फिर भी भुगतान न हुआ। बेंच ने कृषि उत्पादन मंडी समिति को साफ आदेश दिया – 6 हफ्तों में नई दरों पर पूरा मुआवजा दो। अगर देरी हुई, तो 12 प्रतिशत ब्याज के साथ! वाह, क्या बात है। ये फैसला सिर्फ मुरादाबाद तक सीमित नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश के लाखों किसानों के लिए मिसाल है। सरकार की वो पुरानी आदत – टालना, बहाना बनाना – अब कोर्ट ने तोड़ दी।
किसानों के लिए राहत की किरण
इस फैसले से मुरादाबाद के उन सैकड़ों किसानों को तुरंत राहत मिलेगी, जिन्होंने 1977 से इंतजार किया। नई दरों पर मुआवजा मतलब लाखों-करोड़ों रुपये। कई किसान तो बूढ़े हो चुके, कुछ तो दुनिया छोड़ चुके, लेकिन उनका संघर्ष रंग लाया। कोर्ट ने प्रशासन को चेतावनी दी – आदेश का ईमानदारी से पालन करो, वरना सजा भुगतो। ये सिर्फ पैसे की बात नहीं, सम्मान की। किसान सोचते होंगे, “आखिरकार न्याय मिला।” आने वाले दिनों में ऐसे और मामले तेजी से निपट सकते हैं।
भूमि अधिग्रहण कानून में नई उम्मीद
देखिए भाई, ये फैसला भूमि अधिग्रहण के पूरे सिस्टम को झकझोर देगा। 2013 का नया भूमि अधिग्रहण कानून तो आया, लेकिन पुराने मामले लटके रहे। अब हाईकोर्ट ने साफ कर दिया – देरी बर्दाश्त नहीं। इससे न सिर्फ किसानों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि सरकारें भी सतर्क होंगी। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य जहां विकास के नाम पर जमीनें ली जाती हैं, वहां ये फैसला गाइड बनेगा। साथ ही, धारा 28-ए जैसी प्रावधानों का सही इस्तेमाल होगा। किसान भाइयों, अगर आपके साथ भी ऐसा हुआ है, तो अदालत का रास्ता अपनाएं। न्याय मिलेगा, बस धैर्य रखें।















