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सावधान! इन 3 स्थितियों में पिता की संपत्ति पर नहीं होगा बेटी का हक; हाई कोर्ट ने खारिज किया दावा।

सालों पुरानी रूढ़ि टूटी! अब शादीशुदा बेटी भी बेटे के बराबर हिस्सा लेगी - चाहे पिता 2005 में जीवित हो या न हो। लेकिन 4 खतरनाक जाल ऐसे जहां हक गायब! क्या आपका परिवार फंस चुका? अभी जान लें, वरना पछताएंगे!

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भारतीय परिवारों में संपत्ति बंटवारे का सवाल हमेशा से भावुक और जटिल रहा है। पुरानी रूढ़ियों ने बेटों को तरजीह दी, लेकिन कानून ने बेटियों को बराबरी का हक दिया। अब हर बेटी, शादीशुदा हो या अविवाहित, पिता की पैतृक संपत्ति में बेटे के समान हिस्सेदार है। ये बदलाव दशकों पुरानी असमानता को दूर करने वाले हैं।

सावधान! इन 3 स्थितियों में पिता की संपत्ति पर नहीं होगा बेटी का हक; हाई कोर्ट ने खारिज किया दावा।

कानून का ऐतिहासिक मोड़

साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में बड़ा संशोधन आया, जो 9 सितंबर से लागू हुआ। पहले बेटियां परिवार की संपत्ति में सिर्फ सदस्य होती थीं, हिस्सेदार नहीं। शादी के बाद ये सदस्यता भी छूट जाती। संशोधन ने बेटी को जन्म से ही पैतृक संपत्ति का जन्मजात मालिक बना दिया। इसका असर ये हुआ कि बेटा-बेटी दोनों का अधिकार बराबर हो गया, बिना किसी भेदभाव के। ये कदम महिलाओं को आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।

सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट व्याख्या

2020 में एक अहम फैसले ने सभी संदेह दूर कर दिए। कोर्ट ने कहा कि बेटी का हक उसके जन्म के साथ जुड़ जाता है। ये अधिकार 2005 के समय पिता के जीवित होने पर निर्भर नहीं। चाहे पिता उस वक्त दुनिया में हों या न हों, बेटी का हिस्सा सुरक्षित है। इस फैसले ने लाखों महिलाओं को न्याय का भरोसा दिलाया। अब परिवारों में बेटियों को उनकी कमाई का हक मिलना आसान हो गया।

संपत्ति के प्रकार समझें

संपत्ति दो तरह की होती है, और नियम भी अलग। स्व-अर्जित संपत्ति वो है जो पिता ने अपनी मेहनत से कमाई। इस पर उनका पूरा नियंत्रण रहता है। वो वसीयत लिखकर इसे किसी को भी दे सकते हैं। बेटी यहां जन्म से हकदार नहीं। दूसरी ओर पैतृक संपत्ति चार पीढ़ियों पुरानी विरासत है। पिता, दादा या प्रपितामह से मिली ये संपत्ति बेटे-बेटी सबकी साझा होती है। पिता इसे मनमाने ढंग से नहीं बांट सकते।

संपत्ति का प्रकारमुख्य विशेषताबेटी का अधिकार
स्व-अर्जितपिता की व्यक्तिगत कमाईवसीयत पर निर्भर, कोई जन्मजात हक नहीं
पैतृकचार पीढ़ी पुरानी विरासतजन्म से बराबर हिस्सा, वसीयत बेकार

कब दावा कमजोर पड़ता है

कानून बेटियों के पक्ष में है, लेकिन कुछ हालात में दावा नहीं चलता। अगर पिता ने स्व-अर्जित संपत्ति की वसीयत बना दी, तो बेटी चुनौती नहीं दे सकती। स्वेच्छा से हक-त्याग पत्र पर दस्तखत कर हिस्सा छोड़ दिया, तो पछतावा बेकार। पिता ने जीवित रहते संपत्ति बेच दी, तो वो अब परिवार की नहीं। अगर पैतृक संपत्ति का बंटवारा 2004 के अंत से पहले हो चुका, तो पुरानी व्यवस्था बरकरार रहती। इन बारीकियों को जानना जरूरी है।

परिवारों के लिए सलाह

ये कानून सामाजिक बदलाव लाए हैं। बेटियां अब आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं। लेकिन अज्ञानता से विवाद बढ़ते हैं। हर बेटी को अपने हक की जानकारी रखनी चाहिए। वकील से सलाह लें, दस्तावेज जांचें। परिवार में बातचीत से विवाद सुलझाएं। कानून सबको बराबरी सिखा रहा है। संपत्ति सिर्फ धन नहीं, सम्मान का प्रतीक है। बेटियों को उनका हक मिले, यही न्याय है।

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info@divcomkonkan.in

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