
झारखंड हाई कोर्ट ने बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि घर में कलह की स्थिति बनी रहती है और बेटा-बहू अपने बुजुर्ग माता-पिता को प्रताड़ित करते हैं, तो माता-पिता को उन्हें अपने स्व-अर्जित (Self-acquired) मकान से बाहर निकालने का कानूनी अधिकार है।
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‘शांति से रहने का अधिकार सर्वोपरि’
न्यायमूर्ति राजेश कुमार की पीठ ने एक बुजुर्ग दंपति की याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007” का मूल उद्देश्य बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है, अदालत ने कहा कि यदि एक ही छत के नीचे शांति संभव नहीं है और बुजुर्गों को मानसिक या शारीरिक कष्ट दिया जा रहा है, तो उन्हें प्रताड़ना सहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला रामगढ़ जिले के 75 वर्षीय लखन लाल पोद्दार और उनकी 72 वर्षीय पत्नी उमा रानी पोद्दार से जुड़ा है, बुजुर्ग दंपति ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे और बहू उन्हें लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं, जिससे उनका अपने ही घर में रहना दूभर हो गया है।
- निचली अदालत का आदेश: इस मामले में एसडीएम (SDM) कोर्ट ने पहले ही बेटा-बहू को घर खाली करने का निर्देश दिया था।
- डीसी (DC) का हस्तक्षेप: हालांकि, उपायुक्त (DC) कोर्ट ने इस आदेश में बदलाव कर दिया था, जिसे अब हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है।
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हाई कोर्ट का सख्त रुख
हाई कोर्ट ने उपायुक्त के आदेश को दरकिनार करते हुए एसडीएम के निष्कासन (Eviction) के आदेश को बहाल रखा, अदालत ने साफ किया कि वरिष्ठ नागरिकों को अपनी संपत्ति पर पूरा अधिकार है और यदि संतान उनके जीवन में बाधा उत्पन्न करती है, तो उन्हें बेदखल करना कानूनी रुप से जायज है।
यह फैसला राज्य के उन हजारों बुजुर्गों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह देखा जा रहा है, जो अपनी ही संपत्ति में अपनों के हाथों उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं।















