दुख की उस घड़ी में कागजी कामकाज की चिंता अब इतिहास बन चुकी है। श्मशान घाटों पर ही अंतिम संस्कार के साथ डिजिटल मृत्यु प्रमाण पत्र जारी होने की क्रांतिकारी व्यवस्था ने लाखों परिवारों को सरकारी दफ्तरों के लंबे चक्करों से मुक्ति दिला दी है। यह बदलाव डिजिटल इंडिया की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो जन्म और मृत्यु जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को सरल बना रहा है।

Table of Contents
व्यवस्था कैसे काम करती है?
अब जब कोई अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट पहुंचता है, तो वहां मौजूद प्रशिक्षित कर्मचारी मृतक का नाम, उम्र, मृत्यु की तारीख, जगह और आधार नंबर जैसी बुनियादी जानकारियां मोबाइल ऐप के जरिए तुरंत दर्ज कर देते हैं। यह प्रक्रिया महज कुछ मिनटों में पूरी हो जाती है। इसके बाद संबंधित अधिकारी 24 घंटों के अंदर प्रमाण पत्र को डिजिटल हस्ताक्षर प्रदान कर देते हैं। प्रमाण पत्र में क्यूआर कोड होता है, जिसे स्कैन करके इसकी प्रामाणिकता तुरंत जांच ली जा सकती है। परिवार वाले इसे सीधे ईमेल या सरकारी पोर्टल से डाउनलोड कर लेते हैं।
पहले जहां महीनों लग जाते थे, वहां अब घंटों का इंतजार ही काफी है। यह सुविधा खास तौर पर ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में राहत लेकर आई है, जहां पहले तहसील या नगर निगम के दौरे आम बात थे। पंजाब जैसे राज्य में लुधियाना के श्मशान घाटों पर यह व्यवस्था पूरी तरह से सक्रिय हो चुकी है।
आवेदन की आसान प्रक्रिया
प्रक्रिया इतनी सहज है कि कोई भी व्यक्ति आसानी से इसे अपना सकता है। अंतिम संस्कार के समय बस मृतक का आधार कार्ड या कोई पहचान पत्र साथ रखें। कर्मचारी विवरण भरने के बाद ओटीपी सत्यापन करता है। यदि मृत्यु के 21 दिन बाद आवेदन करना हो, तो ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर फॉर्म भरें। सामान्य देरी के मामले में सात से 15 दिन लगते हैं, जबकि लंबे अंतराल पर 30 से 60 दिन। ट्रैकिंग के लिए आवेदन नंबर का इस्तेमाल करें। ड्राइविंग लाइसेंस सरेंडर से लेकर बीमा क्लेम तक हर काम में यह प्रमाण पत्र काम आता है।
आम लोगों को मिले अपार लाभ
इस नई व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ी है और भ्रष्टाचार की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है। परिवार अब शोक मनाने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, बिना कागजों की फिक्र किए। संपत्ति हस्तांतरण, पेंशन लाभ या चुनावी सूचियों से नाम हटाने जैसे काम तेजी से हो जाते हैं। आधार से जुड़ाव ने डेटा संग्रह को मजबूत बनाया है, जो सरकारी योजनाओं के लिए उपयोगी साबित हो रहा है। किसान परिवारों को जमीन के बंटवारे में खासी आसानी हुई है।
केंद्र सरकार का लक्ष्य 2026 तक पूरे देश में शत प्रतिशत कवरेज सुनिश्चित करना है। पहले जहां जागरूकता की कमी थी, अब जागरूकता अभियान चल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट पहुंच बढ़ने से यह और प्रभावी हो रहा है।
चुनौतियां और आगे का रास्ता
हालांकि कुछ चुनौतियां बाकी हैं, जैसे दूरदराज इलाकों में ट्रेनिंग और तकनीकी बुनियादी ढांचे की जरूरत। लेकिन स्थानीय प्रशासन इन्हें दूर करने में जुटा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह व्यवस्था न केवल प्रशासनिक सुधार लाई है, बल्कि सामाजिक न्याय को भी मजबूत कर रही है। भविष्य में जन्म प्रमाण पत्रों के लिए भी यही मॉडल अपनाया जा सकता है।
यह बदलाव दर्शाता है कि तकनीक दुख की घड़ी को भी सहज बना सकती है। लुधियाना जैसे शहर इसका जीता जागता उदाहरण हैं, जहां रोज सैकड़ों परिवार लाभ उठा रहे हैं। डिजिटल भारत का सपना अब हकीकत बन रहा है।















