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Indian Railway: ट्रेन के गेट वाली खिड़की पर ही क्यों होती हैं ज्यादा लोहे की रॉड? वजह जानकर आप भी कहेंगे- ‘वाह! क्या दिमाग लगाया है’

ट्रेन के गेट वाली खिड़की पर ज्यादा लोहे की रॉड चोरी रोकने का स्मार्ट डिजाइन है। चोर सीढ़ी चढ़कर हाथ अंदर डाल लेते थे, इसलिए 8-10 रॉड लगाई गईं- बाकी में सिर्फ 4-5। इससे चोरी 30-40% घटी। लागत प्रभावी, वंदे भारत में भी पैटर्न वही। रेलवे का दिमागी कदम!

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Indian Railway: ट्रेन के गेट वाली खिड़की पर ही क्यों होती हैं ज्यादा लोहे की रॉड? वजह जानकर आप भी कहेंगे- 'वाह! क्या दिमाग लगाया है'

आपने ट्रेन से यात्रा तो की ही होगी। विंडो सीट की चाहत हर यात्री को होती है, ताकि खुला आसमान और बदलते नजारे सफर को यादगार बनाएं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया कि ट्रेन के गेट के ठीक पास वाली खिड़की पर ही लोहे की रॉडें सबसे ज्यादा क्यों लगी होती हैं? बाकी खिड़कियों में 4-5 रॉडें तो गेट वाली में 8-10 तक। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे का सोचा-समझा सुरक्षा कदम है, जो चोरी की घटनाओं पर लगाम लगाता है।

चोरी की समस्या का इतिहास

ट्रेनों में चोरी कोई नई बात नहीं। पुराने दिनों में जब ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी होती या आउटर पर रुकती, चोर मौके का फायदा उठाते। खासकर गेट वाली खिड़की सबसे असुरक्षित थी। कारण? कोच के दरवाजे पर बनी सीढ़ियां। चोर इन सीढ़ियों पर चढ़कर महज 2-3 सेकंड में खिड़की तक पहुंच जाते। फिर हाथ अंदर डालकर बैग, मोबाइल, नकदी या सामान उड़ा लेते। रात के समय सोते यात्रियों का नुकसान ज्यादा होता। अन्य खिड़कियां जमीन से 1.5 मीटर ऊंची होने से चोरों की पहुंच से बाहर रहतीं।

रेलवे इंजीनियरों ने समस्या की जड़ पहचानी। उन्होंने सिर्फ हाई-रिस्क जोन पर फोकस किया। गेट वाली खिड़की में रॉडों की संख्या बढ़ाकर हाथ घुसाने को नामुमकिन बना दिया। यह डिजाइन स्लीपर, जनरल, आरक्षित और एसी कोच सभी में लागू है। पहले 4-5 रॉडें थीं, अब गैप इतना कम कि चोर का हाथ रुक जाता।

डिजाइन का विज्ञान और प्रभाव

यह बदलाव लागत प्रभावी साबित हुआ। पूरी ट्रेन में हर खिड़की पर रॉड लगाना महंगा पड़ता, इसलिए सिर्फ खतरे वाली जगह पर। रेलवे के आंकड़ों के अनुसार, इस डिजाइन से चोरी की घटनाओं में 30-40% कमी आई। 2025 में भी 50,000 से ज्यादा चोरी केस दर्ज हुए, लेकिन यह संख्या पहले से काफी कम है। यात्री संगठन IRIS ने इसे सराहा, कहा कि यह सस्ता और प्रभावी उपाय है।

नई वंदे भारत जैसी ट्रेनों में थोड़ा बदलाव है। वहां मजबूत कांच और एलएचबी कोच के कारण रॉडें कम हैं, लेकिन पैटर्न वही। एलएचबी कोच में क्रम्पल जोन और एंटी-क्लाइंबिंग कूपलर होने से क्रैश रेसिस्टेंस बेहतर है। पुराने आईसीएफ कोच में रॉडें स्टोन-पेल्टिंग और इंट्रूजन से बचाव करती थीं।

अन्य सुरक्षा उपाय और चुनौतियां

रेलवे अब सिर्फ रॉडों पर नहीं रुका। हर कोच में इमरजेंसी विंडो (लाल खिड़की) लगाई गईं, जिनमें स्लाइडिंग रॉड होती है। इन्हें ब्रेक करके बाहर निकला जा सकता है, लेकिन चोरी रोधी। सीसीटीवी, जीपीएस ट्रैकिंग और स्मार्ट लॉक सिस्टम जोड़े गए। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “सुरक्षा पहले!” भविष्य में एआई कैमरा और रीयल-टाइम अलर्ट सिस्टम आ सकते हैं।

फिर भी चुनौतियां बाकी। भीड़भाड़ वाले जनरल कोच में चोरी ज्यादा। यात्री जागरूक रहें: सामान ऊपरी बर्थ पर रखें, रात में खिड़की बंद रखें। यह छोटा-सा डिजाइन यात्रियों का सच्चा रक्षक है। वाह! क्या दिमाग लगाया रेलवे ने। 

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info@divcomkonkan.in

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