
साल के 12 महीनों में से फरवरी ही इकलौता ऐसा महीना है जो सबसे छोटा होता है, जहां अन्य महीनों में 30 या 31 दिन होते हैं, वहीं फरवरी में केवल 28 दिन (और लीप वर्ष में 29 दिन) ही क्यों होते हैं? इसके पीछे कोई वैज्ञानिक नियम नहीं, बल्कि प्राचीन रोम का 2000 साल पुराना इतिहास और अजीबोगरीब अंधविश्वास छिपा है।
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10 महीनों का हुआ करता था साल
इतिहासकारों के अनुसार, रोम के सबसे पुराने कैलेंडर में केवल 10 महीने होते थे और साल की शुरुआत मार्च से होती थी, उस दौर में दिसंबर के बाद के करीब 61 दिनों को कैलेंडर में जगह नहीं दी गई थी क्योंकि कड़ाके की ठंड के कारण इस दौरान न खेती होती थी और न ही कोई युद्ध।
अंधविश्वास और ‘सम’ संख्याओं का डर
713 ईसा पूर्व में रोमन राजा नुमा पोंपिलियस ने कैलेंडर को चंद्रमा के चक्र (Lunar Cycle) के अनुरूप बनाने के लिए इसमें जनवरी और फरवरी के दो महीने जोड़े, रोमनों का मानना था कि सम संख्याएं (Even Numbers) अशुभ होती हैं, इसलिए राजा नुमा ने साल के दिनों को 355 करने का लक्ष्य रखा और अधिकांश महीनों को 29 या 31 दिनों का कर दिया।
फरवरी ही क्यों बना ‘बलि का बकरा’?
गणित के हिसाब से 355 का आंकड़ा छूने के लिए कम से कम एक महीने का ‘सम संख्या’ (Even) होना जरूरी था, चूंकि फरवरी साल का आखिरी महीना था और इसे शुद्धिकरण (Purification) व मृतकों की याद के लिए समर्पित माना जाता था, इसलिए इसे ‘अशुभ’ मानकर 28 दिनों का छोड़ दिया गया।
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जूलियस सीज़र और लीप ईयर का विज्ञान
बाद में जूलियस सीज़र ने कैलेंडर में सुधार कर इसे सौर वर्ष (Solar Year) के करीब लाया, पृथ्वी को सूर्य का चक्कर लगाने में लगभग 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं, इन अतिरिक्त घंटों को संतुलित करने के लिए ही हर 4 साल में फरवरी में एक अतिरिक्त दिन जोड़ा गया, जिसे हम लीप ईयर (Leap Year) कहते हैं।















