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समोसा भारतीय है ही नहीं! जानें किस देश से भारत आया आपका पसंदीदा स्नैक और क्या था इसका असली नाम

चाय के साथ खाते हो ना हर रोज? ये तो मध्य पूर्व का तोहफा है, जो सदियों पहले व्यापारियों ने भारत लाया। नाम बदल गया, आलू भरा गया, लेकिन रहस्य अब खुलेगा। पढ़ो पूरी कहानी!

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चाय की प्याली के साथ तिकोने, कुरकुरे समोसे का नजारा तो हर भारतीय घर की शान है। स्कूल की कैंटीन से लेकर रेलवे प्लेटफॉर्म तक, यह स्नैक हर दिल पर राज करता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह चटपटा स्वाद भारत की मिट्टी का नहीं, बल्कि हज़ारों किलोमीटर दूर मध्य पूर्व के रेगिस्तानी इलाकों से चला आया है। सदियों का लंबा सफर तय कर यह व्यंजन हमारी थाली में जगह बना चुका।

समोसा भारतीय है ही नहीं! जानें किस देश से भारत आया आपका पसंदीदा स्नैक और क्या था इसका असली नाम

जन्म मध्य पूर्व की रेतों में

समोसे की दास्तान शुरू होती है दसवीं शताब्दी के आसपास मध्य पूर्व से। वहां के व्यापारी और यात्री इसे अपने साथ ले जाया करते थे, क्योंकि यह लंबी यात्राओं के लिए बिल्कुल माकूल था। शुरू में इसका नाम कुछ ऐसा था जो फारसी या अरबी जड़ों से जुड़ा हुआ लगता था, जैसे संबुश्क या संबूसाक। यह गोल या चपटे आकार का होता था, जिसमें मीट का कीमा, प्याज, सूखे मेवे और तीखे मसाले भरे जाते थे। फिर इसे तेल में भून लिया जाता, ताकि बाहर से कुरकुरा और अंदर से रसीला रहे।

ग्यारहवीं शताब्दी तक यह शाही दरबारों तक पहुंच चुका था। गजनवी जैसे राजाओं के महलों में इसे खास मेहमानों के लिए तैयार किया जाता। इतिहासकारों की किताबों में इसका जिक्र मिलता है, जहां इसे नमकीन पैटीस की तरह वर्णित किया गया। यात्रियों के लिए यह परफेक्ट स्नैक था, जो दिनों तक खराब न हो। मध्य एशिया के रास्तों से होते हुए यह धीरे-धीरे पूर्व की ओर बढ़ा।

भारत की धरती पर कदम

तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी के बीच, जब मध्य एशिया से व्यापारी कारवां और शाही लशकर भारत आए, तो उनके बैगों में यह व्यंजन भी समा गया। दिल्ली सल्तनत के शासकों ने इसे अपनाया और राजसी भोज का हिस्सा बना दिया। तुगलक के दरबार में तो इसे शरबत के साथ परोसने का रिवाज था। कवि अमीर खुसरो जैसे साहित्यकारों ने भी इसके स्वाद की तारीफ अपनी रचनाओं में की।

समय के साथ नाम बदल गया। यहां इसे समोसा या संसा कहा जाने लगा। बिहार और बंगाल जैसे इलाकों में इसका तिकोना आकार देखकर सिंघाड़ा नाम पड़ गया। मुगल बादशाहों ने इसे और निखारा, जहां आइन-ए-अकबरी जैसी किताबों में इसका उल्लेख शाही पकवानों में हुआ। लेकिन असली कमाल तब हुआ जब पुर्तगालियों ने सोलहवीं सदी में भारत में आलू का बीज लाया। तब तक मीट या मेवे पर निर्भर यह स्नैक मसालेदार आलू-मटर के भराव से आम आदमी का दोस्त बन गया।

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तिकोना रहस्य और देसी जादू

क्यों तिकोना? इसका ठीक-ठीक जवाब तो कोई नहीं दे सकता, लेकिन माना जाता है कि मध्य पूर्वी प्रभाव से ऐसा आकार आया। भारत आते ही स्थानीय मसाले जैसे जीरा, धनिया, हरी मिर्च ने इसे अपना रंग दे दिया। चाय की संस्कृति के साथ यह स्ट्रीट फूड का बादशाह बन गया। आज हर कोने पर ढाबों, ठेलों से इसकी खुशबू उड़ती है। बाजार में इसकी डिमांड इतनी है कि करोड़ों का कारोबार घूमता है।

दुनिया में फैला स्वाद

यह सफर यहीं थमा नहीं। नेपाल में सिंगाड़ा, अफ्रीका में सम्बूसा, इजराइल में सन्बूसक के नाम से जाना जाता है। इंडोनेशिया में मीट भरा, तो फिलीपींस में केला वाली फिलिंग। लेकिन भारत ने इसे सबसे ज्यादा अपना बनाया। हर त्योहार, परीक्षा या बारिश के दिन इसका साथ जरूरी लगता है।

यह कहानी बताती है कि खाना सिर्फ पेट भरने वाला नहीं, बल्कि संस्कृतियों का पुल है। अगली बार जब आप समोसा चखें, तो सोचिएगा, यह ईरान की रेतों से होकर आपकी प्लेट तक कैसे पहुंचा। स्वादिष्ट इतिहास का यह टुकड़ा हमें जोड़ता भी है और हैरान भी करता है। 

Author
info@divcomkonkan.in

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