केंद्र सरकार ने संसद में एक बड़ा खुलासा किया है। पिछले पांच सालों में SC, ST और OBC वर्गों से IAS, IPS व IFS जैसी शीर्ष सेवाओं में कुल 1288 अधिकारियों की भर्ती हुई। यह आंकड़ा सामाजिक न्याय की दिशा को दर्शाता है, लेकिन कई सवाल भी खड़े करता है। OBC का हिस्सा सबसे मजबूत दिखा, जबकि सेवाओं के बीच अंतर ने बहस छेड़ दी है।

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आरक्षित वर्गों के चयन का ब्रेकडाउन
2020 से 2024 तक चली सिविल सेवा परीक्षाओं के नतीजों ने साफ तस्वीर पेश की। OBC से कुल 731 चयन हुए। इनमें IAS के 245, IPS के 255 और IFS के 231 पद शामिल हैं। SC वर्ग को 371 अधिकारी मिले, जिनमें IAS में 135, IPS में 141 तथा IFS में 95 नाम हैं। ST वर्ग का आंकड़ा 186 रहा, जिसमें IAS को 67, IPS को 71 और IFS को 48 अधिकारी आवंटित हुए।
यह वितरण आरक्षण कोटे से मेल खाता नजर आता है। OBC को 27 प्रतिशत, SC को 15 प्रतिशत तथा ST को 7.5 प्रतिशत हिस्सा मिलना तय है। आंकड़े बताते हैं कि IPS में आरक्षित वर्गों की तादाद सबसे ज्यादा रही। कुल 467 अधिकारियों ने इस सेवा को चुना, जबकि IAS में 447 और IFS में 374। विशेषज्ञ इसे परीक्षा पैटर्न व कैडर पसंद से जोड़ते हैं।
तालिका से समझें आंकड़ों की गहराई
| सेवा | OBC | SC | ST | कुल आरक्षित |
|---|---|---|---|---|
| IAS | 245 | 135 | 67 | 447 |
| IPS | 255 | 141 | 71 | 467 |
| IFS | 231 | 95 | 48 | 374 |
| कुल | 731 | 371 | 186 | 1288 |
यह तालिका दर्शाती है कि OBC ने सभी क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाई। IPS का आकर्षण अधिक दिखा, जो क्षेत्रीय चुनौतियों व त्वरित पोस्टिंग का परिणाम हो सकता है। IAS जैसे नीति-निर्धारक पदों पर SC-ST का प्रतिनिधित्व थोड़ा पीछे रहा।
रिक्त पदों का बढ़ता बोझ
भर्ती के बावजूद इन सेवाओं में खाली पदों की संख्या चिंताजनक है। IAS के 6877 स्वीकृत पदों में से 5577 भरे हैं, यानी 1300 रिक्त। IPS के 5099 में 505 तथा IFS के 3193 में 1029 पद खाली पड़े हैं। उत्तर प्रदेश व अन्य बड़े कैडरों में यह कमी सबसे गंभीर है। देरी से भर्ती प्रक्रिया व प्रोन्नति रुकावटें इसका कारण बनीं। 2025-26 में 1056 नई भर्तियां प्रस्तावित हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धा तेज होगी।
राजनीतिक व सामाजिक बहस
विपक्ष ने आंकड़ों पर सवाल ठोके। उनका कहना है कि सामान्य वर्ग की तुलना में आरक्षित वर्ग पीछे हैं, खासकर IAS में। पूर्व अधिकारियों के विवादों ने चर्चा को हवा दी। सत्ताधारी पक्ष का तर्क है कि कोटा पूरी तरह लागू हो रहा। OBC का बढ़ता चयन सकारात्मक कदम है। सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि कोचिंग व संसाधनों पर जोर दिया जाए। पिछड़े क्षेत्रों के युवाओं को बेहतर अवसर मिलें।
आगे की राह
ये आंकड़े प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने का आईना हैं। आरक्षण नीति सफल रही, लेकिन रिक्तियों का जख्म गहरा है। समावेशी विकास के लिए नई रणनीति जरूरी। क्या आगामी बजट में सुधार के संकेत मिलेंगे? संसद के सत्र में यह मुद्दा गरमाया तो तय है। देश का भविष्य इन आंकड़ों पर टिका है।















