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सरकार का बड़ा ऐलान, जेल गए आंदोलनकारियों को मिलेंगे ₹7,000 महीना, बढ़ गई पेंशन

पहाड़ के वीरों को मिला बड़ा तोहफा। जेल या चोट खाने वालों की पेंशन बढ़ी, शहीद परिवारों को भी दोगुना फायदा। बुजुर्ग नायक अब तसल्ली से जिएंगे। ये खबर पढ़कर आप चौंक जाएंगे!

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राज्य निर्माण की नींव रखने वाले उन साहसी सपूतों को आज एक नया जीवन दान मिला है, जिन्होंने 1990 के दशक में जेल की सलाखों के पीछे समय बिताया। उत्तराखंड सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए ऐसे आंदोलनकारियों की मासिक पेंशन में उल्लेखनीय वृद्धि की घोषणा की है। अब कम से कम सात दिनों तक जेल में रहे या आंदोलन के दौरान घायल हुए नायकों को प्रतिमाह 7000 रुपये मिलेंगे। यह कदम न सिर्फ उनके बलिदान की याद दिलाता है, बल्कि बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा का आश्वासन भी देता है।

सरकार का बड़ा ऐलान, जेल गए आंदोलनकारियों को मिलेंगे ₹7,000 महीना, बढ़ गई पेंशन

बलिदान की गाथा, जो इतिहास बनी

उत्तराखंड अलग राज्य बने, इसके लिए चले आंदोलन ने पूरे पहाड़ को हिला दिया था। हजारों लोग सड़कों पर उतरे, पुलिस की लाठियां खाईं, जेल गए और कई ने अपनी जान तक गंवा दी। इन वीरों ने सपना देखा था एक समृद्ध राज्य का, जो आज वास्तविकता है। समय के साथ इनके परिवारों की हालत कमजोर हुई, लेकिन सरकार ने उनकी पुकार सुनी। पहले जहां पेंशन सीमित थी, अब इसे बढ़ाकर सम्मानजनक स्तर पर लाया गया है। जेल या चोट की श्रेणी वाले आंदोलनकारियों को यह विशेष लाभ मिलेगा, जो उनके संघर्ष को मूर्त रूप देगा।

पेंशन में व्यापक बदलाव

इस फैसले का दायरा सिर्फ जेल गए लोगों तक सीमित नहीं। सामान्य श्रेणी के आंदोलनकारियों की पेंशन भी बढ़ाई गई है, ताकि कोई पीछे न छूटे। शहीद हुए साथियों के आश्रित परिवारों को अब मजबूत आर्थिक सहारा मिलेगा। सबसे ज्यादा राहत पूर्ण रूप से शय्याग्रस्त या विकलांग आंदोलनकारियों को दी गई है, जिनकी पेंशन दोगुनी से अधिक हो गई। साथ ही चिकित्सा देखभाल की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई। यह बदलाव तत्काल लागू होगा, जिससे हजारों परिवारों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी।

मुख्यमंत्री का संकल्प, सशक्तिकरण की दिशा

मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि राज्य आंदोलन के नायकों का सम्मान ही असली उत्तराखंड की पहचान है। उनकी सामाजिक और आर्थिक मजबूती सरकार की प्राथमिकता है। राज्य स्थापना दिवस के मौके पर लिया गया यह निर्णय भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। आंदोलनकारी संगठनों ने इसे स्वागत योग्य बताया, जबकि कुछ ने इसे लंबे इंतजार का फल करार दिया। एक बुजुर्ग आंदोलनकारी ने भावुक होकर कहा, हमने खून बहाया, अब सम्मान मिला।

राज्य निर्माण दिवस पर विशेष उपहार

यह घोषणा राज्य के गौरवशाली इतिहास को ताजा करती है। 40 से ज्यादा शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ नहीं गई। सरकार ने विकास पर भी ध्यान दिया, लेकिन आंदोलनकारियों का मुद्दा सबसे ऊपर रहा। यह कदम अन्य राज्यों के लिए मिसाल कायम कर सकता है, जहां स्वतंत्रता संग्राम या आंदोलनों के योद्धा अक्सर भुला दिए जाते हैं। उत्तराखंड अब उनके सपनों को निभाने के प्रति गंभीर दिख रहा है।

इस फैसले से न केवल आर्थिक मदद मिलेगी, बल्कि उन वीरों को वह दर्जा मिलेगा जो उनका हक था। पहाड़ी राज्य की यह पहल सामाजिक न्याय की मिसाल बनेगी।

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info@divcomkonkan.in

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