केंद्र सरकार ने स्कूली शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव करते हुए ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। अब केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और हजारों सरकारी स्कूलों में 5वीं व 8वीं कक्षा की वार्षिक परीक्षा में असफल छात्रों को स्वतः अगली कक्षा में प्रमोशन नहीं मिलेगा। यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया है, जिसका उद्देश्य छात्रों में सीखने की क्षमता बढ़ाना और शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारना है।

Table of Contents
नीति बदलाव की मुख्य विशेषताएं
नई व्यवस्था के तहत फेल छात्रों को परीक्षा परिणाम घोषित होने के दो महीने के भीतर विशेष कक्षाओं के माध्यम से तैयारी का अवसर मिलेगा। इसके बाद एक ही पुनर्परीक्षा का मौका प्रदान किया जाएगा। यदि छात्र इस परीक्षा में भी सफल नहीं होते, तो उन्हें उसी कक्षा में दोबारा प्रवेश लेना होगा। हालांकि, RTE अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार 8वीं कक्षा तक किसी भी छात्र को स्कूल से निष्कासित नहीं किया जाएगा। परीक्षाएं अब रटंतवाद पर आधारित नहीं रहेंगी, बल्कि समझ, कौशल और समग्र विकास पर केंद्रित होंगी। कक्षा शिक्षक असफल छात्रों और उनके अभिभावकों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।
यह परिवर्तन दिसंबर 2024 से प्रभावी हो चुका है। पहले 2019 में ही RTE से नो-डिटेंशन प्रावधान हटा लिया गया था, लेकिन पूर्ण कार्यान्वयन में समय लगा। वर्तमान में 16 राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेश इस नीति को अपना चुके हैं।
बदलाव का पीछे कारण
पुरानी नो-डिटेंशन नीति से छात्रों में लापरवाही बढ़ गई थी। फेल होने का कोई डर न होने से पढ़ाई के प्रति उदासीनता फैल गई। हालिया आंकड़ों के अनुसार, कक्षा 10वीं और 12वीं में लाखों छात्र असफल हो रहे थे, जो बुनियादी सीखने के स्तर में गिरावट को दर्शाता है। आलोचकों का मानना था कि स्वतः प्रमोशन से शिक्षकों की जवाबदेही कम हो गई। अब यह कदम NEP के मूल सिद्धांतों कौशल विकास, व्यावहारिक शिक्षा और निरंतर मूल्यांकन के अनुरूप है। पूर्व अधिकारियों ने भी इसे आवश्यक बताया कि बेसिक पढ़ाई में कमजोर छात्रों को बिना सुधार प्रमोट करने से भविष्य की शिक्षा प्रभावित होती है।
प्रतिक्रियाएं और संभावित चुनौतियां
माता-पिता और शिक्षक संगठनों ने इस बदलाव का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना जागेगी और पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित होगा। ग्रामीण क्षेत्रों के अभिभावक इसे सकारात्मक मान रहे हैं, क्योंकि अब स्कूलों में गुणवत्ता सुधार की उम्मीद है। हालांकि, विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं कि ग्रामीण इलाकों में अतिरिक्त परीक्षा की व्यवस्था, शिक्षक प्रशिक्षण और संसाधनों की कमी चुनौती बन सकती है। ड्रॉपआउट दर बढ़ने का खतरा भी है, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में। सफलता सुनिश्चित करने के लिए सरकार को अतिरिक्त कोचिंग, डिजिटल टूल्स और अभिभावक जागरूकता कार्यक्रम चलाने होंगे।
भविष्य की दिशा
यह नीति बदलाव भारतीय शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मानकों के करीब ले जाने का प्रयास है। NEP 2020 के तहत 5+3+3+4 की नई संरचना, बहुभाषी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पहले से लागू हो रहे हैं। यदि ठीक से कार्यान्वित हुआ, तो आने वाले वर्षों में छात्रों का कौशल स्तर ऊंचा होगा। सरकार का लक्ष्य 2030 तक साक्षरता दर 100% करना है, और यह कदम उसी दिशा में महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर, फेल होने का डर अब छात्रों को बेहतर बनाने का माध्यम बनेगा।















