सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट क्षेत्र में निवेश करने वाले लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट फैसला सुनाया कि आवासीय फ्लैट को किराए पर देने मात्र से वह व्यावसायिक संपत्ति में तब्दील नहीं हो जाती। यह निर्णय 4 फरवरी 2026 को जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने सुनाया। अब बिल्डरों के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत शिकायत करने का अधिकार सुरक्षित रहेगा, भले ही फ्लैट किराए पर दिया गया हो।

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मामले की शुरुआत गुरुग्राम से
यह विवाद हरियाणा के गुरुग्राम से जुड़ा है। विनीत बहरी समेत दो खरीदारों ने डीएलएफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से आवासीय फ्लैट खरीदे थे। लेकिन डेवलपर ने कब्जा देने में छह साल की देरी कर दी। खरीदारों ने देरी के कारण हुए नुकसान, अतिरिक्त ब्याज और अन्य शुल्कों की भरपाई के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) में शिकायत दर्ज की। बिल्डर ने बचाव में कहा कि खरीदारों ने कब्जा मिलते ही फ्लैट को किराए पर दे दिया, इसलिए यह व्यावसायिक उद्देश्य वाली खरीद थी। वे उपभोक्ता नहीं माने जा सकते। एनसीडीआरसी ने डेवलपर के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह पलट दिया।
कोर्ट ने क्यों अस्वीकार किया बिल्डर का दावा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संपत्ति का वर्गीकरण खरीद के मूल उद्देश्य से तय होता है, न कि बाद में किराए पर देने से। केवल फ्लैट को किराए पर देना यह साबित नहीं करता कि खरीदारी प्रमुख रूप से व्यापारिक लाभ के लिए की गई थी। कमर्शियल प्रॉपर्टी वह होती है जो मूल रूप से व्यवसाय चलाने या मुनाफा कमाने के इरादे से डिजाइन या खरीदी जाती है, जैसे दफ्तर, दुकान या फैक्टरी। कोर्ट ने जोर दिया कि बिल्डर को यह साबित करना पड़ता है कि खरीदार का प्राथमिक मकसद मुनाफाखोरी का व्यापार था। एनसीडीआरसी का फैसला गलत बताते हुए कोर्ट ने मामले को वापस आयोग भेज दिया।
निवेशकों और बाजार पर क्या असर?
यह फैसला उन परिवारों के लिए वरदान है जो अतिरिक्त फ्लैट खरीदकर ईएमआई चुकाने या आय के लिए किराए पर देते हैं। अब वे बिल्डरों की देरी या धोखाधड़ी के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में आसानी से लड़ सकेंगे। रियल एस्टेट बाजार में डेवलपर्स की मनमानी पर अंकुश लगेगा और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा। हालांकि, आयकर, लोन या स्टांप ड्यूटी जैसे नियमों पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा। संपत्ति का मूल दर्जा आवासीय ही बना रहेगा। कानूनी विशेषज्ञ इसे उपभोक्ता अधिकारों की मजबूती का प्रतीक मान रहे हैं। भविष्य के विवादों में यह नजीर बनेगा।
मध्यमवर्ग के लिए बड़ी जीत
देशभर में करोड़ों लोग आवासीय फ्लैटों को किराए पर देकर गुजारा करते हैं। दो-तीन फ्लैट होने मात्र से कोई व्यापारी नहीं बन जाता। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को मजबूती दी। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे प्रॉपर्टी बाजार में पारदर्शिता आएगी। बिल्डर अब आसानी से उपभोक्ता दर्जा चुनौती नहीं दे सकेंगे। यह फैसला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक न्याय का भी उदाहरण है।















